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विज्ञान और साहित्य

 

 

मैं विज्ञान और साहित्य में कोई विरोध नहीं देखता -


वैज्ञानिक प्राकृतिक प्रक्रियाओं और पदार्थों का अध्ययन कर आधारभूत सिद्धांतों और संरचनाओं का उद्घाटन करते हैं... प्रकृति की भव्य जटिलता को बोधगम्य बनाते हैं... उसकी रहस्यमयता का अनावरण करते हैं. पर मानव चित्त (मनस) से अधिक गुह्य प्रकृति में भला और क्या? विश्व के श्रेष्ठ साहित्य को इसी परम गुल्थी को समझने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. स्तरीय साहित्यकार अपनी पैनी दृष्टि से, अपनी प्रेक्षण क्षमता से, मनस की विभिन्न प्रवृत्तियों का -- क्षुद्र से लेकर उद्दात तक -- निरूपण और विश्लेषण कर हमें प्रकृति के ही एक पक्ष से अवगत कराता है. (और यह पक्ष हमारे इतना समीप कि इस ज्ञान को हम आत्मज्ञान भी कह सकते हैं.)

वैज्ञानिक और साहित्यकार दोनों ही प्रकृति के अनुशीलक हैं.